Monday, February 28, 2011

शास्त्रों में सामान्यत: संसार में मिलने वाले सुख एवं दु:ख के तीन भेद बताए गए हैं:

आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक। आज संसार में मनुष्य इन्हीं तीन प्रकार के दु:खों से बचने के लिए सुख की खोज कर रहा है। सुख की तलाश में कभी सिनेमाघरों में जाता है तो कभी हिल स्टेशन इत्यादि पर भ्रमण करता है। कभी शराब का सेवन करता है और कभी भोगों को भोगता है। परंतु मनुष्य का यह प्रयास सुख की प्राप्ति नहीं, अपितु दु:ख को भूल जाने की चेष्टा मात्र है।  इसलिए किसी महापुरुष ने कहा है, दु:ख को भूल जाना एक बात है, परंतु सुख की प्राप्ति हो जाना कुछऔर। इससे यह स्पष्ट होता है कि सुख-दु:ख का अनुभव मनुष्य की आंतरिक अवस्था पर निर्भर है। महत्व इस बात का नहीं कि दूसरों का व्यवहार हमारे प्रति कैसा है, अपितु इसका है कि हम दूसरों के व्यवहार को किस दृष्टि से लेते हैं।
संत महापुरुष समझाते हैं कि सुख का संबंध तो मनुष्य की आंतरिक अवस्था से जुडा है। जैसे कैकेयी के वरदान मांगने से प्रभु श्रीराम को चौदह वर्ष वनवास के लिए प्रस्थान करना पडा। रास्ते में वे सीता जी और लक्ष्मण जी सहित निषादराज के पास ठहरे। संध्या समय प्रभु श्रीराम को पत्थरों की शैया पर लेटे देख निषादराज की आंखों में आंसू आ गए और वे लक्ष्मण की तरफ देखते हुए कहते हैं-
कैकयनंदिनी मंद मति कठिन कुटिलपनु कीन्ह। जेहिं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह।। राजा कैकेय की बेटी कैकेयी बहुत ही मंदबुद्धि है, जिसने प्रभु श्रीराम को सुख के अवसर पर दुख दे दिया। महाराज दशरथ तो श्रीराम को राज्य देने जा रहे थे, परंतु कैकेयी की कुटिलता के कारण प्रभु श्रीराम एवं जानकी जी को वन जाना पड रहा है। लेकिन लक्ष्मण की दृष्टि इससे भिन्न थी। वे निषादराज से कहते हैं कि आप जो कैकेयी को दोष दे रहे हैं यह उचित नहीं। इसमें कैकेयी का कोई दोष नहीं है। यह सब तो कर्मो का फल है-
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।
निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।
लक्ष्मण जी कहते हैं कि कोई किसी को सुख-दु:ख देने वाला नहीं है। यह तो भ्राता श्रीराम अपने ही कर्म का फल भोग रहे हैं। निषादराज लक्ष्मण जी की तरफ आश्चर्यचकित नेत्रों से देखते हैं कि क्या आप कहना चाहते हैं कि प्रभु श्रीराम को स्वयं के द्वारा किए गए कर्मो के कारण दु:ख भोगना पड रहा है। लक्ष्मण कहते हैं कि मैंने ऐसा कब कहा कि प्रभु श्रीराम दुख भोग रहे हैं। मैंने तो यह कहा कि वे अपने कर्म का फल भोग रहे हैं, परंतु उन्हें इस अवस्था में देखकर कष्ट किसे हो रहा है? इस समय दुखी कौन दिखाई दे रहा है, आप या प्रभु श्रीराम? निषादराज ने कहा कि दुखी तो मैं ही हूं, प्रभु को इस प्रकार पत्थरों की शैया पर लेटे हुए देख कर मुझे बहुत कष्ट हो रहा है। लक्ष्मण जी कहते हैं कि यदि आपको कष्ट हो रहा है तो आपके ही कर्मो का फल होगा। आपकी आंखों से आंसू बह रहे हैं। परंतु प्रभु श्रीराम तो आनंदित नजर आ रहे हैं और जहां आनंद हो, हर्ष हो वहां शोक कैसा?
स्वयं प्रभु श्रीराम भी जब अयोध्या में माता कौशल्या जी के पास गए तो माता कौशल्या ने प्रेम सहित श्रीराम को फल एवं मिष्ठान्न खाने के लिए दिया। प्रभु श्रीराम माता कौशल्या जी को हर्षित देखकर कहते हैं कि माता आप तो मेरे युवराज बनने के समाचार से इतना प्रसन्न हैं। परंतु जब आपको यह पता लगेगा कि मुझे राजा बना दिया गया है तब आपकी प्रसन्नता कितनी बढ जाएगी। माता कौशल्या आश्चर्यचकित नेत्रों से प्रभु श्रीराम की ओर देखते हुए कहती हैं कि क्या राजा बना दिया है? प्रभु श्रीराम कहते हैं कि हां, मां मुझे राजा बना दिया है। पितां दीन्ह मोहि कानन राजू। पिताजी ने मुझे वनों का राज्य दे दिया है। अयोध्या के सिंहासन पर बैठकर तो मैं केवल शोभा की वस्तु बन जाता। अत: मेरी आवश्यकता इस समय वनों में है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि सुख-दु:ख का अनुभव मनुष्य की आंतरिक अवस्था पर निर्भर है। महत्व इस बात का नहीं कि दूसरों का व्यवहार हमारे प्रति कैसा है, अपितु इसका है कि हम दूसरों के व्यवहार को किस दृष्टि से लेते हैं। आज के भौतिक युग में अधिकतर मनुष्य केवल सांसारिक धन-संपत्ति इत्यादि को ही सुख का हेतु मानते हैं। परंतु यह आवश्यक नहीं कि केवल सांसारिक धन-संपत्ति के द्वारा ही हमें सुख की प्राप्ति हो जाए। यह मानव का सबसे बडा भ्रम है कि उसके पास अपार धन संपत्ति है, कारोबार चल रहे हैं, किसी भी प्रकार के पदार्थ की कोई कमी नहीं, इसलिए वह सुखी है। आज इसी मृगतृष्णा में मानव भटक रहा है, जबकि सांसारिक वस्तुओं में सुख नहीं है। कई बार मनुष्य के सामने ऐसी परिस्थिति भी आती है कि संसार में मिलने वाला कष्ट भी हमें सुख प्रदान कर देता है। संसार से मिलने वाला वह दुख भी हजार सुखों से महान है, जो हमें परमात्मा से मिला दे। महाभारत युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर राजा बन गए, तब भगवान श्रीकृष्ण कुंती के पास गए और द्वारिका जाने के संबंध में बताते हुए पूछा कि बुआ मांगो तुम्हें क्या चाहिए। कुंती ने कहा कि संसार में जितने दुख हैं, सब मुझे दे दो। कुंती से ऐसा सुनकर श्रीकृष्ण ने कहता कि बुआ आप क्या मांग रही हैं? पूरे जीवन आपने दुख ही तो देखे हैं, फिर भी आप दुख मांग रही हैं। कुंती ने कहा- आज तक दुख था, संकट थे, तो आप हमारे साथ थे और आज जब यह राज्य मिला तो आप हमें छोड कर जा रहे हैं। ऐसे सुख का क्या लाभ जो हमें आपसे दूर कर दे। संत सहजोबाई कहती हैं -
सुख के माथे सिल पडे जो नाम हृदय से जाए।
बलिहारी वा दुख के रहे नाम लौ लाय।।
उस सुख का क्या लाभ जो हमें प्रभु से दूर ले जाए।
आचार्य अत्रि की पुत्री अपाला के शरीर पर कुछ दाग थे। उम्र के साथ-साथ दाग बढते जा रहे थे। ये दाग अत्रि को चिंता में डाल रहे थे। अत: उन्होंने अपाला की शादी अपने ही एक शिष्य के साथ कर दी। शादी के बाद कुछ समय तो वह खुश रही। परंतु जैसे-जैसे समय गुजरता गया, रोग बढता गया। साथ ही अपाला से पति की दूरी भी बढती गई। एक दिन पति ने उसे घर से निकाल दिया। वह रोती हुई जंगल की ओर चल पडी। रास्ते में उसे एक महात्मा मिले। उन्होंने अपाला को समझाया कि यह संसार तो दुख और स्वार्थ से भरा है। इस मायामय जगत में कोई सुखी नहीं है। प्रत्येक मनुष्य सुख प्राप्ति की इछा से सांसारिक कर्मो में लिप्त है। हे अपाला! यह रोग तो पिछले जन्मों में किए गए कर्मो का ही फल है। कर्मो के इस बंधन से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय है-नाम। मनुष्य जीवन का महत्व तो तभी है, जब जीव प्रभु की प्राप्ति की ओर अग्रसर हो। क्योंकि केवल वह परमात्मा ही परम सुखदायक है और जीव को इस जगत के दुखों और बंधनों से छुटकारा दिलाने में पूरी तरह समर्थ है। इसलिए तू आत्मज्ञान को जान और उस प्रभु को प्राप्ति कर जो तुझे परम सुख एवं शांति प्रदान करने वाला है।
इसके बाद अपाला दिन-रात प्रभु के ध्यान में ही लीन रहने लगी। साधना करते कई साल बीत गए। अपाला की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे परमात्मा ने दर्शन दिए। प्रभु ने कहा- हे अपाला! तुझको इस रोग ने बहुत दुख दिया। अगर तू कहे तो मैं इस रोग को ठीक कर दूं। अपाला ने कहा- प्रभु! इसी रोग के कारण तो मुझे संसार की वास्तविकता का पता चला। इस रोग ने ही मुझे संसार से तोड कर आप से जोडा। अत: आप यदि मुझे कुछ देना ही चाहते हैं तो अपने चरणों की प्रीति प्रदान करें। अपाला की भक्ति की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। वह पूरी तरह स्वस्थ भी हो गई। यह खबर जब अपाला के पति के पास पहुंची तो वह भी पहुंचा। उसने अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगी और घर चलने का आग्रह किया, परंतु अपाला ने इंकार कर दिया। अपाला ने कहा कि आपने पति होते हुए भी मेरा परित्याग कर दिया, परंतु परमात्मा ने मुझे मेरे रोगी शरीर में भी अपनी भक्ति प्रदान कर चरणों से जोडा। अत: अब तो यह जीवन प्रभु के चरणों में ही समर्पित हो चुका है।
ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि जब भक्तों ने संकट के समय प्रभु को याद किया, प्रभु ने उनकी रक्षा की। अकसर मनुष्य दुख के समय ही प्रभु को याद करता है। सुख के समय सांसारिक सुखों को ही सब कुछ समझ कर आनंदित होता रहता है। कबीर दास जी कहते हैं-
दुख में सुमिरन सब करे सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुख काहे को होय।।
दु:ख के समय में तो सभी प्रभु को याद करते हैं। जब-जब भी जीव पर कष्ट आता है तभी वह प्रभु को पुकारता है, परंतु जैसे ही सुख मिलता है तभी प्रभु को भूल जाता है। कबीर जी कहते हैं कि यदि सुख के समय भी प्रभु को याद रखें तो दु:ख हो ही क्यों?
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते। अत: हम यदि जीवन में शाश्वत सुख एवं शांति की प्राप्ति करना चाहते हैं तो हमें जरूरत है कि हम पूर्ण सतगुरु की शरण में पहुंचकर आत्मज्ञान को प्राप्त करें। तभी हम जीवन को सुखमय बना सकते हैं।
आशुतोष जी महाराज
 

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