| क्या आप हमेशा थकान, तनाव या दबाव महसूस करती हैं? घरेलू कार्य या बच्चे के प्रोजेक्ट्स ऑफिस तक भी आपका पीछा नहीं छोडते? क्या घर पहुंचने के बाद वॉशिंग मशीन में कपडों का ढेर इतना होता है कि पसंदीदा टीवी सीरियल्स तक नहीं देख पातीं? यहां तक कि नींद में भी आपको काम के सपने आते हैं? अगर आप हमेशा थकान या दबाव महसूस करती हैं, अपराध-बोध से ग्रस्त हैं, घरेलू समस्याएं आपके जेहन पर हमेशा हावी रहती हैं तो इसका अर्थ है कि सुपर मॉम सिंड्रोम ने आपको जकड रखा है। खतरा कहां है एक लेखिका अपने ब्लॉग पर लिखती हैं कि कुछ वर्ष पूर्व स्पॉन्डलाइटिस ने उन्हें इस तरह घेरा कि काम करना उनके लिए संभव नहीं रहा। वह कई महीने व्हील चेयर पर रहीं। पत्नी, मां, डाइटीशियन, शिक्षिका होने के अलावा वह मॉडल बेटी की मैनेजर भी थीं। जिम्मेदारियों के बीच कभी सेहत का ध्यान नहीं रखा, जिसका नतीजा यह हुआ कि वह बिस्तर पर पड गई। विशेषज्ञ कहते हैं, सुपर मॉम सिंड्रोम तनाव, अवसाद, बेचैनी, अनिद्रा, दबाव व अकेलेपन की भावना भर देता है। यह कभी जीवन का आनंद नहीं उठाने देता। एक ताजा रिसर्च कहती है कि स्त्रियां अपनी हर परेशानी के लिए खुद को दोषी मानती हैं, जबकि पुरुष ऐसा नहीं करते। लंदन के डेली मेल में छपी इस स्टडी के मुताबिक 75 प्रतिशत स्त्रियों ने माना कि जब से वे मां बनीं, उनमें ग्लानि व अपराधबोध अधिक पनप गया। खुद को दोषी समझने की यह प्रवृत्ति संबंधों, पेरेंटिंग, सेहत जैसे पहलू पर अधिक पनपती है। बचें इस जुनून से मूलचंद मेडसिटी, नई दिल्ली में मनोचिकित्सा एवं वयस्क स्वास्थ्य मनोविज्ञान के कंसल्टेंट डॉ. जितेंद्र नागपाल कहते हैं, करियर और घर के बीच तालमेल बिठाने वाली ज्यादातर स्त्रियों के लिए पेरेंटिंग सबसे मुश्किल काम है। मगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो सुपर मॉम सिंड्रोम से काफी हद तक बचा जा सकता है। 1. संतुलन बिठाना सीखें। प्राथमिकता सूची में उन्हीं कामों को रखें, जो वास्तव में उस वक्त जरूरी हैं। जैसे बच्चे..। घरेलू काम उम्र भर के हैं, लेकिन उनका बचपन फिर नहीं लौटेगा। 2. स्वास्थ्य की कीमत समझें। किसी भी समस्या को नजरअंदाज न करें। ऐसा न हो कि जब तक इसका महत्व समझें, देर हो चुकी हो और आप कई बडी बीमारियों से घिर जाएं। 3. हर पल का लुत्फ उठाएं। दोस्तों के करीब रहें। परिवार के साथ घुले-मिलें। कल की चिंता में अपने आज को न खोएं। 4. बच्चों को हर सुविधा दे सकती हैं, इस दबाव में न रहें। इससे अपराधबोध, विफलता व निराशा की भावना पैदा होती है। बच्चों व परिवार के साथ रिश्ते भी बिगडते हैं। 5. दिन में 30-40 मिनट अपने लिए भी निकालें। पत्नी, मां, नौकरीपेशा स्त्री होने के साथ ही आप इंसान भी हैं, यह न भूलें। कोई शौक पैदा करें। जैसे संगीत, नृत्य या पुस्तकें..। हर समय सिर्फ घर की सफाई के बारे में न सोचें, वह कभी ज्यादा साफ नहीं होगा। 6. खुद को विफल न समझें। बच्चों के खराब मार्क्स आने या घरेलू अव्यवस्था के लिए अकेली आप ही जिम्मेदार हैं, इस भावना को मन से निकालें। अपने कामों में घर के अन्य सदस्यों की भी मदद लें। 7. अपनी स्थिति को दूसरे की नजर से न परखें। यह न सोचें कि आपकी कोई दोस्त या संबंधी आपसे बेहतर मां या पत्नी है। जो भी काम आप कर रही हैं, उसे महत्वपूर्ण समझें। 8. एकरसता जीवन को बोझिल बनाती है। कभी कुछ ऐसा करें, जो नीरसता तोडे। स्पा लें, पार्लर चली जाएं, हेयर स्टाइल बदलें..या म्यूजिक कंसर्ट में शिरकत करें। याद रखें : सारे काम किए जा सकते हैं, लेकिन सारे काम एक बार में नहीं किए जा सकते। स्त्री परिवार का दिल है। उसे परफेक्ट होने की नहीं, केवल मां बनने की जरूरत है। |
| इंदिरा राठौर |
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Monday, February 28, 2011
हर वक्त काम का जुनून क्यों
इंकार से इतना डर क्यों
भय के लक्षण
1. माता-पिता यदि बच्चे की दूसरों से तुलना करने लगें तो उसे लगता है कि वह अच्छा नहीं है। यह बात उसके मन में बैठ जाती है। समय के साथ यह भय फैलता है।
2. व्यक्ति अपने दायरे में सिमटने लगता है, वह अपनी भावनाएं शेयर नहीं कर पाता।
3. वह धीरे-धीरे अपना व्यक्तित्व खोने लगता है। वह परफेक्ट व्यक्ति की तरह बोलने-काम करने की कोशिश करता है।
4. वह किसी को न नहीं कह पाता। साथ ही दूसरों को नजदीक लाने से घबराता है।
5. वह अपनी छवि दूसरों के हिसाब से गढने लगता है। खुद को स्वीकार नहीं पाता।
कैसे निकलें इस डर से
दिल्ली की वरिष्ठ मैरिज काउंसलर डॉ. आर. वसंता पत्री कहती हैं, शुरू में ही इस भय से उबरने की कोशिश न की जाए तो बाद में व्यवहार संबंधी दिक्कतें भी पैदा हो सकती हैं। कुछ टिप्स इससे उबरने के-
1. अपने बारे में अपनी राय बदलें। अगर कोई अपनी बातों से आपको आहत करता है या चोट पहुंचाता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आप खुद को उसकी नजर से देखने लगें। दूसरों की राय को महत्व देने से पहले यह जानना जरूरी है कि आपकी अपने बारे में क्या राय है।
2. इनकार के भय को चुनौती मानें। अपने विचारों को वास्तविकता के धरातल पर सोचें तो इस भय को खत्म करने में मदद मिलेगी।
3. भय के बारे में लिखें। जिन चीजों से भय लगता है, उन्हें महसूस करें कि यह भय किस स्तर पर है। बेहतर तरीका है कि एक कागज-कलम लेकर लिखें कि भविष्य के बारे में सोचते हुए क्या महसूस करते हैं।
4. यह लिखने के बाद कि कौन सी बात आपको भयग्रस्त करती है, अगला कदम यह सोचने का है कि आपके भय कितने वास्तविक हैं। किसी खास घटना या स्थिति में ऐसा लगता है कि भय वास्तविक है, लेकिन वह समय गुजरने के बाद वे भय निरर्थक भी लगने लगते हैं।
करीबी लोग भी दें सहयोग
एक वेबसाइट के सर्वेक्षण के अनुसार करीबी लोगों के प्रयास भी व्यक्ति को इस भय से उबरने में मदद कर सकते हैं-
1. उसे अपनी बात रखना सिखाएं।
2. अपनी लाइफस्टाइल बदलना और अपने प्रति ईमानदार रहना सिखाएं।
3. उसे अपनी भावनाएं शेयर करने को कहें।
4. उससे एक सामान्य व्यक्ति की तरह व्यवहार करें। उसे खुद के प्रति आशावादी बनने के लिए प्रोत्साहित करें।
5. कभी भी उसे नजरअंदाज न करें। उसकी बात ध्यान से सुनें और उसे महत्व दें।
स्त्रियों में अधिक होता है यह भय
ऐसे पुरुष व स्त्रियां, जो बेहद खूबसूरत दिखना चाहते हैं, रिजेक्शन के भय से ज्यादा ग्रस्त होते हैं। इसका कारण है कि वे हमेशा अपने साथियों से अपनी तुलना करते रहते हैं। साइंस डेली में प्रकाशित एक स्टडी के मुताबिक खूबसूरत दिखने का दबाव पुरुषों की तुलना में स्त्रियों पर अधिक होता है। ऐसी लडकियां जो खूबसूरत अभिनेत्रियों को आदर्श मानती हैं, उनमें यह सौंदर्य-सतर्कता अधिक होती है। जाहिर है उनमें रिजेक्शन का भय भी अधिक होता है।
और मान्यता मिल गई..!!
हमारी पडोसन मुझे भयंकर गालियां देती हैं। खरी-खोटी सुनाती हैं। फिर चाहे मैं अपना अपने घर के सामने स्कूटर साफकरूं या पत्नी के साथ बतियाऊं। उन्हें मुझे गाली देना पसंद है। मैं बहुत परेशान रहा। जैसी भयानक वह हैं, उतनी ही खराब गालियां देती हैं। जब भी कहीं जाने के लिए प्रसन्न मन से घर से बाहर निकलता हूं, वह खलल डाल देती हैं। कोई जमाना था, जब मैं इससे बहुत अपसेट हो जाता था। वह ऐसा क्यों करती हैं, हम दंपती अभी तक नहीं समझ सके हैं। आखिरकार हमने उनकी इस आदत को मान्यता प्रदान कर दी। वह अब गाली देती हैं तो हमें बुरा नहीं लगता। हम अपनी दिनचर्या पर उनकी गालियों का असर महसूस नहीं करते। मुहल्ले-पडोस के लोग मान चुके हैं कि वे हैं ही ऐसी। बल्कि अब जब वह शांत रहती हैं तो मोहल्ला अशांत हो जाता है। सूना-सूना सा लगने लगता है।
मान्यता प्रदान करने का अब पूरा असर दिखने लगा है। अब बुराई-बुराई सी नहीं लगती। गाली-गाली सी नहीं लगती। उनकी गाली का असर जाता रहा।
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