हमारी पडोसन मुझे भयंकर गालियां देती हैं। खरी-खोटी सुनाती हैं। फिर चाहे मैं अपना अपने घर के सामने स्कूटर साफकरूं या पत्नी के साथ बतियाऊं। उन्हें मुझे गाली देना पसंद है। मैं बहुत परेशान रहा। जैसी भयानक वह हैं, उतनी ही खराब गालियां देती हैं। जब भी कहीं जाने के लिए प्रसन्न मन से घर से बाहर निकलता हूं, वह खलल डाल देती हैं। कोई जमाना था, जब मैं इससे बहुत अपसेट हो जाता था। वह ऐसा क्यों करती हैं, हम दंपती अभी तक नहीं समझ सके हैं। आखिरकार हमने उनकी इस आदत को मान्यता प्रदान कर दी। वह अब गाली देती हैं तो हमें बुरा नहीं लगता। हम अपनी दिनचर्या पर उनकी गालियों का असर महसूस नहीं करते। मुहल्ले-पडोस के लोग मान चुके हैं कि वे हैं ही ऐसी। बल्कि अब जब वह शांत रहती हैं तो मोहल्ला अशांत हो जाता है। सूना-सूना सा लगने लगता है।
मान्यता प्रदान करने का अब पूरा असर दिखने लगा है। अब बुराई-बुराई सी नहीं लगती। गाली-गाली सी नहीं लगती। उनकी गाली का असर जाता रहा।
No comments:
Post a Comment