Monday, February 28, 2011

हर वक्त काम का जुनून क्यों


क्या आप हमेशा थकान, तनाव या दबाव महसूस करती हैं? घरेलू कार्य या बच्चे के प्रोजेक्ट्स ऑफिस तक भी आपका पीछा नहीं छोडते? क्या घर पहुंचने के बाद वॉशिंग मशीन में कपडों का ढेर इतना होता है कि पसंदीदा टीवी सीरियल्स तक नहीं देख पातीं? यहां तक कि नींद में भी आपको काम के सपने आते हैं?
अगर आप हमेशा थकान या दबाव महसूस करती हैं, अपराध-बोध से ग्रस्त हैं, घरेलू समस्याएं आपके जेहन पर हमेशा हावी रहती हैं तो इसका अर्थ है कि सुपर मॉम सिंड्रोम ने आपको जकड रखा है।
खतरा कहां है
एक लेखिका अपने ब्लॉग पर लिखती हैं कि कुछ वर्ष पूर्व स्पॉन्डलाइटिस ने उन्हें इस तरह घेरा कि काम करना उनके लिए संभव नहीं रहा। वह कई महीने व्हील चेयर पर रहीं। पत्नी, मां, डाइटीशियन, शिक्षिका होने के अलावा वह मॉडल बेटी की मैनेजर भी थीं। जिम्मेदारियों के बीच कभी सेहत का ध्यान नहीं रखा, जिसका नतीजा यह हुआ कि वह बिस्तर पर पड गई।
विशेषज्ञ कहते हैं, सुपर मॉम सिंड्रोम तनाव, अवसाद, बेचैनी, अनिद्रा, दबाव व अकेलेपन की भावना भर देता है। यह कभी जीवन का आनंद नहीं उठाने देता।
एक ताजा रिसर्च कहती है कि स्त्रियां अपनी हर परेशानी के लिए खुद को दोषी मानती हैं, जबकि पुरुष ऐसा नहीं करते। लंदन के डेली मेल में छपी इस स्टडी के मुताबिक 75 प्रतिशत स्त्रियों ने माना कि जब से वे मां बनीं, उनमें ग्लानि व अपराधबोध अधिक पनप गया। खुद को दोषी समझने की यह प्रवृत्ति संबंधों, पेरेंटिंग, सेहत जैसे पहलू पर अधिक पनपती है।
बचें इस जुनून से
मूलचंद मेडसिटी, नई दिल्ली में मनोचिकित्सा एवं वयस्क स्वास्थ्य मनोविज्ञान के कंसल्टेंट डॉ. जितेंद्र नागपाल कहते हैं, करियर और घर के बीच तालमेल बिठाने वाली ज्यादातर स्त्रियों के लिए पेरेंटिंग सबसे मुश्किल काम है। मगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो सुपर मॉम सिंड्रोम से काफी हद तक बचा जा सकता है।
1. संतुलन बिठाना सीखें। प्राथमिकता सूची में उन्हीं कामों को रखें, जो वास्तव में उस वक्त जरूरी हैं। जैसे बच्चे..। घरेलू काम उम्र भर के हैं, लेकिन उनका बचपन फिर नहीं लौटेगा।
2. स्वास्थ्य की कीमत समझें। किसी भी समस्या को नजरअंदाज न करें। ऐसा न हो कि जब तक इसका महत्व समझें, देर हो चुकी हो और आप कई बडी बीमारियों से घिर जाएं।
3. हर पल का लुत्फ उठाएं। दोस्तों के करीब रहें। परिवार के साथ घुले-मिलें। कल की चिंता में अपने आज को न खोएं।
4. बच्चों को हर सुविधा दे सकती हैं, इस दबाव में न रहें। इससे अपराधबोध, विफलता व निराशा की भावना पैदा होती है। बच्चों व परिवार के साथ रिश्ते भी बिगडते हैं।
5. दिन में 30-40 मिनट अपने लिए भी निकालें। पत्‍‌नी, मां, नौकरीपेशा स्त्री होने के साथ ही आप इंसान भी हैं, यह न भूलें। कोई शौक पैदा करें। जैसे संगीत, नृत्य या पुस्तकें..। हर समय सिर्फ घर की सफाई के बारे में न सोचें, वह कभी ज्यादा साफ नहीं होगा।
6. खुद को विफल न समझें। बच्चों के खराब मा‌र्क्स आने या घरेलू अव्यवस्था के लिए अकेली आप ही जिम्मेदार हैं, इस भावना को मन से निकालें। अपने कामों में घर के अन्य सदस्यों की भी मदद लें।
7. अपनी स्थिति को दूसरे की नजर से न परखें। यह न सोचें कि आपकी कोई दोस्त या संबंधी आपसे बेहतर मां या पत्नी है। जो भी काम आप कर रही हैं, उसे महत्वपूर्ण समझें।
8. एकरसता जीवन को बोझिल बनाती है। कभी कुछ ऐसा करें, जो नीरसता तोडे। स्पा लें, पार्लर चली जाएं, हेयर स्टाइल बदलें..या म्यूजिक कंसर्ट में शिरकत करें।
याद रखें : सारे काम किए जा सकते हैं, लेकिन सारे काम एक बार में नहीं किए जा सकते। स्त्री परिवार का दिल है। उसे परफेक्ट होने की नहीं, केवल मां बनने की जरूरत है।
इंदिरा राठौर
 

No comments:

Post a Comment